अवधी कय आपन एक सम्पन्न इतिहास है । अवधी कवनो परिचय कय महोताज नाइ है । अवधी खालि भारत नाइ नेपाल कय तराइ प्रदेश के लुम्बिनी प्रदेश मे बोले जाय वाला दुसरा बडा भाषा  होय । अवधी भाषा साहित्य कय परिचय कय रुप म गोस्वामी तुलसिदास रचित “रामचरितमानस ” औ मलिक मुहम्मद जयासी  द्वारा रचित “पदमावत” कय अवधी कय मजबुत खम्बा कै रुप मे पहिचान दिलावा गवा है ।

रामचरितमानस सन १६३१ मे औ पदमावत सन १५९६ कय आसपास या रामचरितमानस मे ३४ बर्ष पहिले रचा गवा रहा है । लेकिन अवधी साहित्य कय वसे पहिले कय इतिहास न केहु लिखिस न केहु प्रचार करिस । अवधी साहित्य कय दस्तावेजिकरण स.न. १००० कय वाद कय साहित्य कै किहागवा है लेकिन वसे पहिले कै साहित्य कै दस्तावेज कहु कहु उल्लेख भवल देखात है ।

के होय आदिकवी कुकरिप्पा ?

राहुल सङ्कृत्ययन एक भारतिय प्रख्यात भाषाविद साहित्यकार होय । वनकय पुस्तक हिन्दी काव्य यात्रा मे चौरासी सिद्ध लोगन कय सन्दर्भ मे कुकरिप्पा कै बर्णन किहे है । कुकरिप्पा कय परिचय मे वन कहे है । वनकय जन्म ८४० इ .  (देवपाल ८०९-४९) कै आसपास औ देश -गण राज्य कपिलवस्तु, जात ब्राह्मण बताए है । अपने पुस्तक हिन्दी काव्य धारा मे कुकरिप्पा द्वारा लिखित पुस्तक (१) योगभवनोपदेश (२) स्रबपरिच्छेदन कय बारे मे भि उल्लेख किहे है । उहीँ पुस्तक हिन्दी काव्य धारा मे हि वनकय तीन कविता कय बर्णन भि किहा है ।

कबितांस

” कूर्म दूहि पात्र घरन न जाय

बृक्षेर इम्लि कुमिर खाय

आगन घर पुनि सुनु कुविज्ञाती

कानेट चोरी लियेउ अघराती”

पहिला पंक्ति

अर्थ : कछुवा (कुर्म ) जेतना भि दूध देय , वसे खाली दुई बर्तन भर मिलि , जवन अपने घरे न लैहाय पाई ।

भवार्थ : कवनो भि ब्यक्ति केतना भि परिश्रम करै यदि वकर घर परिवार कय ब्यवहार सहि नाइ है तो वह परिश्रम कय फल नाइ पाई ।

दुसरा पंक्ति

अर्थ: इम्लि कै पेड मे फर फरा लेकिन उ फर कुमर () खाइ गय

भावर्थ : मेहनत दुसर केहु करै फर दुसर केहु खाय ।

तिसरा पंक्ति

अर्थ : अगना औ घर मे सोना है लेकिन उ स्त्री कुलहिन (कुविज्ञाती ) हि ।

भावर्थ : बाहर सम्पत्ति होएक बावजुद भि आन्तरिक नैतिकता आचरण ठिक नाइ है तो उ धन भि ब्यर्थ है ।

चौथा पंक्ति

अर्थ : कानगय गाउन (कानेट) रातकय चोरी करिन।

भावर्थ: स्त्री चुपचाप रातमे अपने घरकय गहना  चोराइकय लैके जात हि । इ वकरे दुश्कर्म कय  संकेत होय ।

सार

यह चार पंक्ति मे जिवनकय अस्थिरता माया औ लोभ कय प्रभाव औ घरपरिवार मे होय वाला चोरी जालसाझ कय खेदपुर्ण स्थिति कय बर्णन किहा गवा है ।

यह हमरे  कहि सका जात है अवधी कय आदिकवि कुकरिप्पा कै कविता मे   समाज , समाजिकता , संस्कृति ,प्रकृति कै चिन्तन भक्ती भाव भि देख सका जात है । अइसे हि कुकरिप्पा कै बहुत सारा “लोकभाका ” जवने कय  हमरे कहावत कहाजात है , उ भि बहुत प्रचलित है । जैसे:

“पडोसी कय छइया निक, आपन घर अधियार ।

कुकरिप्पा कहि गए , बिना सम्झै करै बिगाड “

भावर्थ : दुसरे कय चिज हम्मन कय हमेसा अच्छा लागत है , आपन मुल्य कब्बो नाइ पहिचाना जात है । औ बिना समझे काम करे  वाले हमेसा नुक्सान हि करत है ।

अइसे हि वनकय बहुत सारा रचना इतिहास कय पन्ना कय बिच मे दब कय दफन होइ गय । इतिहासकार लोग बतावत है कि भारत मे बिृटिस सरकार कै हुकुमत कै समय पे वनकय बहुत सारा पुस्तक अङ्ग्रेजी मे अनुवाद कैके मुल पुस्तक कै नस्ट किहे रहे ।

प्राचीन कपिलवस्तु गण राज्य लगायत भारत मे संत साहित्य परम्परा रहेक नाते वन्हे जाने बुझे वाले संत साहित्यकार लोग वनकय बारेमे कहु कहु कहत सुनात है । नाइतो प्रामाणिक रुपमे वनकय बारे मे बहुत कम हि जानेक मिलत है ।

अवधी साहित्य कय क्षेत्र मे कम समय मे आपन पुस्तक ग्रन्थ से भाषा कय पहिचान दिलावे वाले अवधी कय पहिला कवि आदिकवि कुकरिप्पा कै अवधी साहित्य मे इ बडा योगदान कय रुप मे है। यसे वाले वाले पुस्ता कै भि अवधी साहित्य औ अवधी साहित्यकार लोगन कै बारे मे  जाने बुझे कै प्रेरणा मिलि ।

सन्दर्भ शुचि : बिक्रम मणि त्रिपाठी , हमार भाषा कक्षा ९